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कड़ाके की ठंड फसलों के लिए वरदान:डा.श्योकंद

23 जनवरी 2010
सिरसा(सिटीकिंग) इन दिनों पड़ रही कड़ाके की ठंड से आम जनजीवन भले ही अस्त-व्यस्त हो रहा हो, किसान के खेतों में लहलहाती फसल के लिए यह मौसम बहुत अच्छा है। जी हां, हाड़तोड़ ठंड और धुंध खेतों में सोना बरसने जैसी घटना है। गेंहू और सरसों दोनों के लिए यह वरदान से कम नहीं। वरिष्ठ वैज्ञानिक और कृषि विज्ञान केंद्र सिरसा के प्रभारी डा. बीएस श्योकंद ने यह टिप्पणी चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय सिरसा के सामुदायिक रेडियो स्टेशन के रोजाना कार्यक्रम हैलो सिरसा में दी। सामुदायिक रेडियो के निदेशक वीरेंद्र सिंह चौहान के साथ श्रोताओं से बातचीत करते हुए डा. श्योकंद ने पशुपालकों को मशविरा दिया कि वे अपने दुधारू पशुओं को ठंड से बचाने के उपाय अवश्य करें। ऐसे पशुओं के पशुघरों में उपले आदि की मदद से तापमान को सामान्य रखने के प्रयास किए जाने चाहिए। मगर उन्होंने जोर देकर कहा कि पशुघरों की खिड़कियों और रोशनदानों को किसी भी सूरत में बंद नहीं किया जाना चाहिए चूंकि गोबर से मीथेन नामक विषैली गैस निकलती है जो पशुघर के हवादार न होने की सूरत में पशुघर में जमा होकर नुकसान पंहुचा सकती है। एक सवाल के जवाब में डा. श्योकंद ने कहा कि पशुपालन अगर वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो आमदनी को बेहतरीन स्रोत हो सकता है। उन्होंने कहा कि हरियाणा बनने से लेकर आज तक राज्य में दूध का उत्पादन एक सौ चवालीस फीसदी बढ़ा है। यह विकास राष्ट्रीय स्तर पर हुई वृद्धि से दोगुणा है। उन्होंने कहा कि हरियाणा में पाई जाने वाली मुर्राह नस्ल की भैंस दुनिया की सर्वश्रेष्ठ नस्ल है चूंकि यह सर्वाधिक दूध देती है। सरकार इस नस्ल के विस्तार व विकास के लिए ठोस उपाय कर रही है। अठारह किलो से अधिक दूध देने वाली मुरार्ह नस्ल की भैंसों के कटड़ों को एक वर्ष का होने पर सरकार दस हजार रूपये में खरीदती है और उनका पालन कर भैंसे के रूप में रियायती दरों पर ग्राम पंचायतों को सौंपती है। इस योजना का मकसद इस नस्ल का संरक्षण है। डा. श्योकंद ने बताया कि सिरसा व आसपास के क्षेत्र में हालांकि मुर्राह भी काफी संख्या में पाई जाती हैं मगर यहां नीली रावी नस्ल की भैंस अधिक पाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि किसी जमाने में हरियाणा नस्ल की जो गाय इस क्षेत्र में खूब पाई जाती थी पिछले बीस वर्षों में यह नस्ल देखते देखते समाप्ति की कगार पर पंहुच गई है। फिलहाल इस क्षेत्र में साहीवाल नस्ल की गाएं अधिक पाली जाती हैं। डा. श्योकंद ने बताया कि संकर नस्ल की गायों की तुलना में देसी नस्लों की गायों का पाल अधिक श्रेयस्कर है। डा.बीएस श्योकंद ने दावा किया कि किसान प्रत्यक्ष दूध बेचकर जितना धन कमाता है, उससे दो सौ गुणा तक मुनाफा कमा सकता है अगर वह दूध के उत्पाद बनाकर बेचे। इसके लिए किसानों को प्रेरित करने के लिए प्रयास जारी हैं। दिल्ली में किसानों ने इस राह पर चलकर अपने जीवन में आमूल चूल बदलाव लाने में कामयाबी हासिल की है। सिरसा में भी स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से इस दिशा में कुछ ठोस करने के लिए किसानों को मार्गदर्शन दिया जा रहा है। एक श्रोता के सवाल के जवाब में डा. श्योकंद ने कहा कि पौष्टिक आहार के अभाव में पशु की न प्रजनन और दूध देने की क्षमता में कमी आती है। पशुओं को पर्याप्त मात्रा में मिनरल मिक्सचर खिला कर इन समस्याओं से छ़ुटकारा पाया जा सकता है। हिसार स्थित चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय में तैयार उत्तर श्रेणी का यह मिश्रण बाजार से आधे दाम पर स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र पर पशुपालकों को मुहैया कराया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पशुओं को हरा चारा भी पर्याप्त मात्रा में खिलाना उनके स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। उन्होंने भेड़-बकरी पालन और मुर्गीपालन को भी फायदे के व्यवसाय करार दिया बशर्तें यह कार्य वैज्ञानिक तौर तरीके से किए जाएं।

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